नमस्कार स्वागत है आप सभी लोगों का गायत्री ज्योतिष केंद्र में हमेशा ही आप लोगों के लिए ज्योतिष शास्त्र से जुड़ी हुई महत्वपूर्ण जानकारी के एपिसोड हम समय- समय में पर प्रसारित करते रहते हैं आज भी हम आप लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण जानकारी लेकर आए हैं
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नौ ग्रहों का विशेष महत्व है कुंडली में इसके स्थान से व्यक्ति का जीवन प्रभावित होता है यदि यह ग्रह उचित स्थान पर है तो जीवन बेहतर यश और कीर्ति से युक्त, से साधन संपन्न वैभव धन- संपत्ति से परिपूर्ण होता है यही ग्रह नीच भाव में होते हैं तो जीवन में कष्ट, हनि,दरिद्रता, मृत्यु योग जैसी बातें देखने को आती है
आज हम आपको बताएंगे चंद्र ग्रह का वैदिक मंत्र इसके परिणाम स्वरूप चंद्र क्षय रोग से ग्रस्त होने लगे और उनकी कलाएं क्षीण नारद जी ने उन्हें मृत्युंजय भगवान आशुतोष की आराधना करने को कहा तो उन्होंने भगवान आशुतोष की आराधना की ।। तो चंद्र ग्रह का वैदिक मंत्र इस प्रकार है.
ओम इमं देवा असपत्न सुवध्वं महते क्षत्राय महते
ज्यैष्ठयाय महते जानराज्यायेनद्रस्येन्द्रियाय।
इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोमी
राजा सोमोस्मांक ब्राह्मणाना राजा।।
चंद्र अंतिम सांसें गिन रहे थे कि भगवान शंकर ने प्रदोषकाल में चंद्र को पुनर्जीवन का वरदान देकर उसे अपने मस्तक पर धारण कर लिया अर्थात चंद्र मृत्युतुल्य होते हुए भी मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए पुनः धीरे-धीरे चंद्र स्वस्थ होने लगे तथा पूर्णमासी पर पूर्ण चंद्र के रूप में प्रकट हुए।।

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